

-बेहद दयालु और करुणामयी स्वभाव वाले व्यक्ति थे महाराजा अग्रसेन : अनिल गोयल
अनिल गोयल, फगवाड़ा: अग्रवाल समाज के संस्थापक एवं 18 गोत्रों के जनक महाराजा अग्रेसन जी का जन्म द्वापर युग के आखिरी चरण में आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा अर्थात नवरात्रि के पहले दिन हुआ था। उनके जन्मदिवस को अग्रसेन जयंती के रुप में मनाया जाता है जो कि इस बार 11 अक्टूबर को पड़ेगी। अग्र बंधुओं के पितृपुरुष महाराजा अग्रसेन भगवान राम के वंशज और भगवान श्रीकृष्ण के समकालीन थे। वे राजा राम के पुत्र कुश की 34वीं पीढ़ी की संतान थे। महाराजा अग्रसेन प्रताप नगर के राजा वल्लभऔर माता भगवती के यहां सूर्यवंशी क्षत्रीय कुल में उनके बड़े पुत्र के रुप में जन्मे थे, जिन्होंने बाद में अग्रवाल समाज का निर्माण एवं अग्रोहा धाम की स्थापना की थी। महाराजा अग्रसेन बेहद दयालु और करुणामयी स्वभाव वाले व्यक्ति थे, जिनके हृदय में मनुष्य समेत पशु-पक्षी एवं जानवरों के लिए भी करुणा भरी हुई थी, यही वजह थी कि उन्होंने धार्मिक पूजा अनुष्ठानों में पशु बलि आदि को गलत करार दिया था एवं अपना क्षत्रीय धर्म त्याग कर वैश्य धर्म की स्थापना की थी। इसके अलावा वह हमेशा अपनी प्रजा की भलाई के बारे में सोचने वाले महान राजा थे, जिनकी प्रसिद्धि एक प्रिय राजा के रुप में फैली हुई थी। महाभारत के युद्ध में 15 साल की आयु में पिता के साथ शामिल भी हुए थे।

महाराजा अग्रसेन की पहली शादी राजा नागराज की पुत्री राजकुमारी माधवी से हुई थी। उनकी यह शादी स्वयंवर के माध्यम से की गई, राजा नागराज के यहां आयोजित इस स्वयंवर में राजा इंद्र ने भी हिस्सा लिया था। वहीं स्वयंवर के दौरान राजकुमारी माधवी द्वारा महाराजा अग्रसेन को अपने वर के रुप में चुनने से राजा इंद्र को काफी अपमानित महसूस हुआ और इससे क्रोधित होकर उन्होंने प्रतापनगर में बारिश नहीं करने का आदेश दिया जिससे प्रतापनगर में भयंकर अकाल के हालत बन गए एवं चारों तरफ त्राहिमाम मच गया, प्रजा भूख-प्यास से तड़पने लगी। जिसके बाद देवी लक्ष्मी ने अग्रसेन जी को सलाह दी कि अगर वे कोलापुर के राजा महीरथ (नागवंशी) की पुत्री से विवाह कर लेंगे तो उन्हें उनकी सभी शक्तियां प्राप्त हो जाएंगी, जिसके चलते इन्द्र को महाराजा अग्रसेन से आमना-सामना करने से पहले कई बार सोचना पड़ेगा। इस तरह महाराजा अग्रसेन ने राजकुमारी सुंदरावती से दूसरा विवाह कर प्रतापनगर को संकट से बचाया।
महाराजा अग्रसेन का ‘एक ईंट और एक रुपया’ का सिद्धांत काफी प्रचलित है। उन्होंने अपने इस सिद्धांत के मुताबिक नगर में आने वाले हर नए परिवार को नगर में रहने वाले हर परिवार की तरफ से एक ईट और एक रुपया देने के लिए कहा। ताकि नगर में आने वाला नया परिवार, नगर में पहले से रह रहे हर एक परिवार से प्राप्त ईटों अपने घर का निर्माण कर सकें एवं उन रुपयों से अपना बिजनेस स्थापित कर सकें। इस सिद्धांत की घोषणा के बाद महाराजा अग्रसेन जी को समाजवाद के प्रणेता के रुप में नई पहचान मिली।

18 गोत्रों की स्थापना: माता लक्ष्मी की कृपा से श्री अग्रसेन के 18 पुत्र हुए। राजकुमार विभु उनमें सबसे बड़े थे। महर्षि गर्ग ने महाराजा अग्रसेन को 18 पुत्रों के साथ 18 यज्ञ करने का संकल्प करवाया। माना जाता है कि यज्ञों में बैठे 18 ऋषियों के नाम पर ही अग्रवंश (अग्रवाल समाज) की स्थापना हुई। जिस समय 18वें यज्ञ में जीवित पशुओं की बलि दी जा रही थी, महाराज अग्रसेन को उस दृश्य को देखकर घृणा उत्पन्न हो गई। उन्होंने यज्ञ को बीच में ही रोक दिया और कहा कि भविष्य में मेरे राज्य का कोई भी व्यक्ति यज्ञ में पशुबलि नहीं देगा, न पशु को मारेगा, न मांस खाएगा और राज्य का हर व्यक्ति प्राणीमात्र की रक्षा करेगा। इस घटना से प्रभावित होकर उन्होंने क्षत्रीय धर्म को त्याग कर वैश्य धर्म अपना लिया।

